तनाव, भावनात्मक द्वंद और बेशुमार फिक्र आज के जीवन के साथ जुड़ गई हैं। जब इसका असर बहुत ज्यादा होता है तो बड़ी आंत अल्सर का शिकार हो जातीं है। इसमें बड़ी आंत की झिल्ली में सूजन आ जाती है। इसे डाक्टरी भाषा में अल्सरेटिव कोलाइटिस कहते हैं। इस बीमारी में कभी कभार एक ऐसा मुकाम भी आता है जब डाक्टर भी हाथ खड़े कर लेते हैं।
ऐसे में मरीज पशोपेश में पड़ जाता है कि अब वह क्या करे और कहां जाए। होम्योपैथी के डाक्टर विकास वर्मा इस सिलसिले में गोंडा जिले के मनकापुर के एसके चतुर्वेदी से बातचीत की वीडियो रिकार्डिंग सुनवाते हैं। वे बताते हैं कि श्री चतुर्वेदी इसी अल्सरेटिव कोलाइटिस के मरीज थे। वर्षों तक एलोपैथी में इलाज चला। एक ऐसा दौर भी आया जब पीजीआई के डाक्टरों ने कह दिया कि साइक्लोस्पोरिन देने के बाद अब कोई और दवा नहीं बची है।
इसके बाद श्री चतुर्वेदी का हश्र जानने से पहले यह समझ लें कि अल्सरेटिव कोलाइटिस आखिर क्या बला है? यह बीमारी क्यों होती है? यह आज भी बहस का मुद्दा है लेकिन यह माना जाता है कि इसका ताल्लुक सबसे ज्यादा तनाव से है। शुरुआती दौर में इसमें बहुत ज्यादा दस्त होता है और इसके साथ आंव आने लगता है। जब इसके साथ ब्लड आने लगता है तो यह बीमारी अपने चरम पर पहुंच जाती है। एलोपैथी में इसमें आम तौर पर कोटिक स्टेरायड का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा इसके साइड एफेक्टस भी हैं।
इसमें ऐसा दौर भी आता है जब बहुत सारा ब्लड निकल जाने के कारण मरीज बहुत ही खतरनाक स्थिति में पहुंच जाता है। ब्लड में हीमोग्लोबिन की मात्रा बहुत कम हो जाती है। प्लेटलेट काउंट गिर जाता है। श्री चतुर्वेदी भी डा. वर्मा के पास कुछ इसी हालात में आए थे। उन्होंने किसी से इनके बारे में सुन रखा था। डा. वर्मा कहते हैं कि इसका मरीज होम्योपैथी के दरवाजे से मायूस हो कर नहीं लौटता है। यहां इसकी कारगर दवा है। लेकिन स्वचिकित्सा के खतरे के मद्देनजर वह दवाओं का नाम बताने से मना करते हैं।
श्री चतुर्वेदी बताते हैं कि इस बीमारी के कारण कमोबेश जीवन से मायूस हो गया था। कहते हैं कि वर्षों की पीड़ा झेलने के बाद 55-56 साल की उम्र में जीवना की नये सिरे से एक शुरुआत की है। दवा के साथ ही जीवनचर्या में थोड़ा बदलाव भी करना पड़ा है।
