बरेली। अखा गांव के बाहर से गुजरने वाली रेलपटरी की तुलना आप उस हाशिए से कर सकते हैं जिसने इसे क्षेत्र को भूगोल का वह हिस्सा बना दिया है जिसके पार विकास मानो वर्जित हो। शहर से करीब दस ही किमी बाहर, बदायूं राजमार्ग से दाईं ओर कटने वाली ऊबड़-खाबड़ सड़क पर कुछ मिनटों के सफर के बाद हम यहां पहुंचते हैं। कार के भीतर सर्दी का पता नहीं था तो बाहर कदम रखते ही सर्द हवा ने तल्खी जताने में देर नहीं की।
अखा के प्रायमरी स्कूल में आज बच्चों की भीड़ नहीं, गरीब-गुर्गों का जमावड़ा था। पूरा अहाता भरा पड़ा था। तेज ठंड के बावजूद एक उम्मीद
उन्हें रोके थी। उम्मीद थी उस आसरे की, जिसके सहारे जाड़ा कट जाएगा। सहारे ने नाउम्मीद भी नहीं किया। आयुक्त दीपक त्रिवेदी और उनकी पत्नी नीलिमा त्रिवेदी ने गरीब और
'आकांक्षा' भी जुटी, कंबल बांटे
बेसहारा वृद्धों को करीब 600 कंबल बांटे । खास बात यह रही कि कंबल पाने वाले लोगों का चयन खुद गांव की एक समिति ने किया और लाभार्थियों की सूची में अखा के बजाय दूसरे गांववासियों का प्रतिनिधित्व ज्यादा रहा।
डॉ. विकास वर्मा इस गांव म आठ महीने में करीब पंद्रह होम्योपैथी शिविर लगा चुके हैं। कहते हैं कि अखा को लेकर मीडिया और बाहर के लोगों की राय चाहे कुछ भी हो इस गांव के लोगों ने उनके शिविरों को लेकर जैसा उत्साह दिखाया है वैसी उन्हें खुद भी उम्मीद नहीं थी। ठाकुर ऋषिपाल सिंह कहते हैं कि गांव वालों ने सरकारी मदद का मुंह ताकने की जगह हाल ही में श्रमदान कर मिट्टी की एक कच्ची सड़क तैयार की। इसके अलावा 'आकांक्षा' की तरफ से तीन महीने में 50 शौचालयों को बनाने की परियोजना गांववालों के उत्साह के चलते केवल 18 दिनों में पूरी हो गई है। संवाददाता
